प्रथमः अपठितः गद्यांशः (Unseen Prose Passage)
संस्कृतम्
शिक्षा न केवलं पुस्तकीयज्ञानस्य संग्रहः, अपितु जीवनस्य सर्वाङ्गीणविकासस्य साधनम्। वर्तमानयुगे तु बालकाः केवलं परीक्षाफलाय अध्ययनं कुर्वन्ति, परन्तु वास्तविकं ज्ञानं तु पर्यावरणावलोकनेन, प्राकृतिकक्रियाभिः, सामाजिकसंवादेन च जायते। यदि विद्यार्थी केवलं ग्रन्थेषु रमते, किन्तु व्यवहारे तस्य कौशलं न्यूनं भवति, तर्हि सा शिक्षा अपूर्णा मन्यते। महर्षिः पतञ्जलिः अवदत् — “अध्ययनं मनः विशुद्धयति, विवेकं प्रददाति, परन्तु प्रयोगः एव विश्वासं जनयति।” अतः विद्यालयेषु बालानां सर्वांगीणविकासाय खेलकला, ध्यानं, सेवाकार्यं, पर्यटनादयः अपि समावेशनीयाः। समाजे ये जनाः नैतिकतायुक्ताः भवन्ति, ते एव सफलतां प्राप्नुवन्ति।
(हिन्दी अनुवाद)
शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन के सर्वांगीण विकास का साधन है। वर्तमान युग में बच्चे केवल परीक्षाफल के लिए पढ़ते हैं, परन्तु वास्तविक ज्ञान पर्यावरण-अवलोकन, प्राकृतिक क्रियाओं और सामाजिक संवाद से होता है। यदि विद्यार्थी केवल पुस्तकों में रमता है, किन्तु व्यवहार में उसका कौशल कम है, तो वह शिक्षा अपूर्ण मानी जाती है। महर्षि पतञ्जलि ने कहा — “अध्ययन मन को शुद्ध करता है, विवेक देता है, परन्तु प्रयोग ही विश्वास पैदा करता है।” अतः विद्यालयों में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए खेल, कला, ध्यान, सेवाकार्य और पर्यटन आदि भी शामिल किए जाने चाहिए। समाज में जो लोग नैतिकता युक्त होते हैं, वे ही सफलता प्राप्त करते हैं।
अस्य गद्यांशस्य अधोलिखिताः प्रश्नाः (Questions on this passage)
प्रश्न 1. 'शिक्षा केवलं पुस्तकीयज्ञानस्य संग्रहः न' इति कस्य विरुद्धम् अस्ति?
(A) जीवनविकासस्य (जीवन-विकास के)
(B) परीक्षाफलस्य (परीक्षाफल के)
(C) प्रयोगस्य (प्रयोग के)
(D) ग्रन्थाध्ययनस्य (पुस्तक-पठन के)
प्रश्न 2. महर्षिः पतञ्जलिः कीदृशस्य महत्त्वं प्रतिपादितवान्?
(A) अध्ययनस्य (अध्ययन का)
(B) ध्यानस्य (ध्यान का)
(C) प्रयोगस्य (प्रयोग का)
(D) सेवायाः (सेवा का)
प्रश्न 3. विद्यालयेषु बालानां सर्वांगीणविकासाय किं किं समावेशनीयम् इति लेखकस्य मतम्?
(A) केवलं पुस्तकानि (केवल पुस्तकें)
(B) खेलकला, ध्यानं, सेवाकार्यं, पर्यटनादयः (खेल-कला, ध्यान, सेवाकार्य, पर्यटन आदि)
(C) केवलं परीक्षासम्पादनम् (केवल परीक्षा सम्पादन)
(D) केवलं व्याकरणम् (केवल व्याकरण)
प्रश्न 4. 'समाजे नैतिकतायुक्ताः जनाः एव सफलतां प्राप्नुवन्ति' – अत्र 'नैतिकता'पदस्य विपरीतार्थकं किम्?
(A) अनैतिकता (अनैतिकता)
(B) अनीतिः (अनीति)
(C) अधर्मः (अधर्म)
(D) अशिष्टता (अशिष्टता)
द्वितीयः अपठितः पद्यांशः (Unseen Poetic Passage)
संस्कृतम्
अहो वसन्तसुन्दरः समागतः सुखप्रदः,
प्रफुल्लपुष्पमञ्जरीभिरावृतः सुगन्धिभिः।
किल क्वणन्मधुव्रताः सुगायिनो भ्रमन्ति च,
नृत्यन्ति केकिनः सदा प्रमुदिताः कृतोत्सवाः॥
तथा च कुसुमोत्करैः तरुः स एष शोभते,
यथा नवं वधूमुखं प्रहर्षितं विराजते।
चकोरकोकिलादयः स्वरैर्मनोहरैः कलैः,
वसन्तसेवनोत्सुकाः दिशन्ति सर्वतः सुखम्॥
(हिन्दी अनुवाद)
अहो! वसंत सुन्दर एवं सुखद आया है, जो सुगन्धित खिले हुए पुष्पों के गुच्छों से ढका हुआ है। भौंरे गुनगुनाते हुए मधुर गायन करते हुए भ्रमण करते हैं, मोर सदा आनन्दित होकर उत्सवपूर्वक नृत्य करते हैं। इसी प्रकार पुष्पसमूहों से वह वृक्ष ऐसा शोभित होता है, जैसे नववधू का हर्षित मुख शोभायमान होता है। चकोर, कोकिल आदि पक्षी मनोहर कल स्वरों से, वसंत की सेवा में उत्सुक होकर सर्वत्र सुख फैलाते हैं।
अस्य पद्यांशस्य अधोलिखिताः प्रश्नाः (Questions on this passage)
प्रश्न 1. वसन्ते के उत्साहपूर्वक नृत्यन्ति?
(A) भ्रमराः (भौंरे)
(B) केकिनः (मयूराः) (मोर)
(C) चकोराः (चकोर)
(D) कोकिलाः (कोयल)
प्रश्न 2. 'तरुः स एष शोभते यथा नवं वधूमुखम्' – अत्र कः अलङ्कारः?
(A) उपमा (उपमा)
(B) रूपकम् (रूपक)
(C) अतिशयोक्तिः (अतिशयोक्ति)
(D) श्लेषः (श्लेष)
प्रश्न 3. 'क्वणन्मधुव्रताः' इत्यस्य कः अर्थः?
(A) गायन करते हुए पक्षी (गाते हुए पक्षी)
(B) गुनगुनाते हुए भौंरे (गुनगुनाते हुए भौंरे)
(C) नाचते हुए मोर (नाचते हुए मोर)
(D) बोलती हुई कोयल (बोलती हुई कोयल)
प्रश्न 4. कविः वसन्ते सर्वत्र कस्य विस्तारं वर्णयति?
(A) दुःखस्य (दुःख का)
(B) शोकस्य (शोक का)
(C) सुखस्य (सुख का)
(D) रोगस्य (रोग का)
उत्तर शीट (Answer Key)
| प्रश्नसंख्या | समुचितविकल्पम् (Correct Option) |
|---|---|
| 1. (प्रथम गद्यांश) | (D) ग्रन्थाध्ययनस्य |
| 2. (प्रथम गद्यांश) | (C) प्रयोगस्य |
| 3. (प्रथम गद्यांश) | (B) खेलकला, ध्यानं, सेवाकार्यं, पर्यटनादयः |
| 4. (प्रथम गद्यांश) | (A) अनैतिकता |
| 1. (द्वितीय पद्यांश) | (B) केकिनः (मयूराः) |
| 2. (द्वितीय पद्यांश) | (A) उपमा |
| 3. (द्वितीय पद्यांश) | (B) गुनगुनाते हुए भौंरे |
| 4. (द्वितीय पद्यांश) | (C) सुखस्य |
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