हिंदी साहित्य के पाँच नए कठिन शब्द : अर्थ एवं विस्तृत व्याख्या
1. कृतार्थ
अर्थ : जिसने अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लिया हो; सफल और संतुष्ट व्यक्ति।
व्युत्पत्ति : संस्कृत के "कृत" (किया हुआ) और "अर्थ" (उद्देश्य) से बना शब्द।
विस्तृत व्याख्या : कृतार्थ शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसने अपने जीवन का लक्ष्य पूरा कर लिया हो। साहित्य में इसका प्रयोग सफलता, संतोष और आत्मतृप्ति के भाव को प्रकट करने के लिए होता है। जब कोई कार्य पूर्ण होकर मन को शांति देता है, तब व्यक्ति स्वयं को कृतार्थ अनुभव करता है।
वाक्य प्रयोग : गुरु के आशीर्वाद से शिष्य स्वयं को कृतार्थ मानने लगा।
2. अनन्य
अर्थ : जो केवल एक के प्रति समर्पित हो; अद्वितीय।
व्युत्पत्ति : संस्कृत के "अन" (नहीं) और "अन्य" (दूसरा) से मिलकर बना शब्द।
विस्तृत व्याख्या : अनन्य शब्द भक्ति और प्रेम साहित्य में विशेष रूप से प्रयुक्त होता है। इसका अर्थ होता है— पूर्ण समर्पण। जब किसी का ध्यान, भावना या निष्ठा केवल एक ही लक्ष्य या व्यक्ति पर केंद्रित हो, तो उसे अनन्य कहा जाता है।
वाक्य प्रयोग : मीरा की कृष्ण के प्रति भक्ति अनन्य थी।
3. विगलित
अर्थ : पिघला हुआ; द्रवित या भावनात्मक रूप से कमजोर।
व्युत्पत्ति : संस्कृत धातु "गल्" से बना है, जिसका अर्थ है — पिघलना।
विस्तृत व्याख्या : विगलित शब्द का प्रयोग साहित्य में भौतिक और भावनात्मक दोनों स्थितियों के लिए किया जाता है। मोम का पिघलना भौतिक विगलन है, जबकि करुण दृश्य देखकर हृदय का द्रवित होना भावनात्मक विगलन कहलाता है।
वाक्य प्रयोग : दीन अवस्था देखकर उसका हृदय विगलित हो उठा।
4. समुज्ज्वल
अर्थ : अत्यंत उज्ज्वल; तेजस्वी और गौरवशाली।
व्युत्पत्ति : संस्कृत के "सम्" (पूर्ण) और "उज्ज्वल" (प्रकाशमान) से बना शब्द।
विस्तृत व्याख्या : समुज्ज्वल शब्द का प्रयोग गौरवपूर्ण अतीत, उज्ज्वल भविष्य या महान चरित्र के लिए किया जाता है। यह शब्द साधारण उजाले से अधिक तीव्र और प्रभावशाली प्रकाश का बोध कराता है। साहित्य में इसका प्रयोग आशा और गर्व के भाव को प्रकट करता है।
वाक्य प्रयोग : देश का भविष्य समुज्ज्वल बनाने का संकल्प लिया गया।
5. निस्संग
अर्थ : आसक्ति से रहित; मोह-माया से मुक्त।
व्युत्पत्ति : "नि:" (रहित) और "संग" (लगाव) से बना शब्द।
विस्तृत व्याख्या : निस्संग शब्द का प्रयोग संत साहित्य और दर्शन में अधिक मिलता है। इसका आशय उस अवस्था से है जिसमें व्यक्ति सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठ जाता है। निस्संगता को आत्मिक शांति और वैराग्य का प्रतीक माना गया है।
वाक्य प्रयोग : संत का जीवन निस्संग और सरल होता है।
निष्कर्ष : ये पाँचों शब्द हिंदी साहित्य की गंभीरता और भावात्मक गहराई को प्रकट करते हैं। इनके प्रयोग से लेखन अधिक परिष्कृत, प्रभावशाली और साहित्यिक बनता है।
पब्लिक 💬 टिप्पणियाँ (Comments) (0)
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी करें!
अपनी टिप्पणी (Comment) दें। 👇